शहर के मुकाबले गांवों में अधिक वोटिंग, बीजेपी-कांग्रेस फिर भी खुश ?, दोनों पार्टियों के हैं अपने-अपने समीकरण, पढ़िए पूरी ख़बर
हरियाणा में मतदान खत्म होने के बाद जहां प्रशासनिक अमला ईवीएम की सुरक्षा तय कर रहा है और ईवीएम को स्ट्रॉंग रूम में रख दिया गया है। पुख्ता सुरक्षा के इंतजाम किए गए हैं। सीसीटीवी से नजर रखी जा रही है। वहीं पार्टियां इस गणित में लग गई हैं कि मतदान के समीकरण उनके पक्ष में किस तरह से बैठ रहे हैं, किस तरह के समीकरण उन्हें सत्ता के नजदीक ले जा रहे हैं।

हरियाणा में पिछली बार से वोटिंग प्रतिशत 5.34 फीसदी कम रहा है। राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस वोटिंग प्रतिशत से बीजेपी का डर थोड़ा कम हुआ है। क्योंकि बीजेपी के खिलाफ चुनाव के दौरान जिस तरह का गुस्सा हर तरफ लोगों में देखा जा रहा था उससे ये लग रहा था कि लोग बढ़-चढ़कर वोट करेंगे, जिससे ये साफ संदेश जाएगा कि लोगों में सरकार के प्रति रोष है, गुस्सा है जिस वजह से लोग ज्यादा से ज्यादा वोट कर रहे हैं। वैसे भी ज्यादा वोटिंग को सरकार के प्रति एंटी-इनकंबेंसी के रूप में देखा जाता है। लेकिन वोटिंग कम होने से बीजेपी ने थोड़ी राहत की सांस ली है। क्योंकि अब बीजेपी को लग रहा है कि एंटी-इनकंबेंसी नहीं है। लोगों में रोष तो था लेकिन शायद वो रोष वोट में तब्दील नहीं हो पाया।

अब ऐसे में सवाल आता है कि जिस बात पर बीजेपी खुश हो रही है उसी बात पर कांग्रेस कैसे खुशी मना सकती है। इसका जवाब ये है कि बीजेपी ओवरऑल वोटिंग पर्सेंटेज से राहत महसूस कर रही है। लेकिन कांग्रेस इस बात से तसल्ली कर रही है, कि गांवों में लोग वोट करने के लिए बड़ी संख्या में निकले हैं। शहरों के मुकाबले गांवों में लोगों ने बढ़-चढ़कर मतदान किया। और इसी वजह से गांवों का वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। जबकि शहरों का वोटिंग प्रतिशत कम रहा है।खासतौर पर किसान आंदोलन वाले क्षेत्रों में भी लोगों ने बढ़-चढ़कर वोट किया है। बस इसी बात की कांग्रेस के मन में खुशी है। क्योंकि कांग्रेस इस बढ़ी हुई वोटिंग को सत्ता के खिलाफ और अपने पक्ष में मान रही है।

अब जैसे की अंबाला और सिरसा इन दो लोकसभा क्षेत्रों में प्रदेश में सबसे अधिक मतदान हुआ है ये दोनों ही सीटें आरक्षित हैं। तो साथ ही इन दोनों ही सीटों पर किसान आंदोलन का भी ज्यादा प्रभाव पड़ा था। ऐसे में ग्रामीणों ने खूब उत्साह के साथ वोट किया है। इतना ही नहीं कुरुक्षेत्र और करनाल में भी इसका काफी असर देखने को मिला है। कुरुक्षेत्र में भी अच्छी वोटिंग हुई है। वहीं करनाल के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों ने खुलकर वोट किया है।

आपको बता दें कि सिरसा और अंबाला दोनों ही जगह जाट, सिख, मुस्लिम और अनुसूचित जाति समुदाय से प्रभावित हैं। ऐसे में अंबाला में बंतो कटारिया और वरुण मुलाना के बीच मुकाबला कड़ा दिखाई दे रहा है। वहीं सिरसा में मुकाबला बीजेपी के अशोक तंवर और कांग्रेस की कुमारी सैलजा में है। यहां हालांकि चुनाव से पहले ही राजनीतिक विश्लेषक ये मान रहे थे कि कुमारी सैलजा एक बड़े मार्जिन से जीत रही हैं। और अब जिस तरह से इस सीट पर सबसे अधिक 69.01 फीसदी मतदान हुआ है उसे कांग्रेस अपने पक्ष में ही मान रही है।

बात कुरुक्षेत्र की करें तो यहां 66.03 फीसदी मतदान हुआ करनाल में 63.02 फीसदी मतदान हुआ। ये दोनों ही लोकसभा क्षेत्र ऐसे रहे हैं जहां किसान आंदोलन का खासा प्रभाव रहा है। इन दोनों ही जिलों में भारतीय किसान यूनियन मजबूत है। और कुरुक्षेत्र लोकसभा सीट पर तो भाकियू (चढ़ूनी ग्रुप) के प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने तो अभय चौटाला को खुले तौर पर समर्थन किया था।करनाल में टिकैत गुट की भाकियू के राज्य प्रधान रतन मान का प्रभाव है और उन्होंने सत्ताधारी दलों के विरोध के साथ-साथ समर्थन का जिम्मा खुद कार्यकर्ताओं पर छोड़ दिया था। अब ऐसे में गांवों में अधिक मतदान जरूर बीजेपी के प्रत्याशियों की चिंता का कारण बन रहा है।

बात भिवानी-महेंद्रगढ़ की करें तो 65.3 फीसदी मतदान यहां हुआ है, हिसार में 64.07 फीसदी मतदान हुआ है। इस बढ़े हुए मतदान को भी किसान आंदोलन के असर के तौर पर देखा जा रहा है। यहां भी खास बात ये है कि यहां शहरों में मतदान कम हुआ है।
दूसरी ओर रोहतक ने भी चौंकाया है, यहां 64.6 फीसदी मतदान हुआ है। जबकि जिस तरह से चुनाव यहां लड़ा जा रहा था और जनता जिस तरह से प्रतिक्रियाएं दे रही थी लग रहा था कि यहां 75 से 80 फीसदी लोग वोट करेंगे। लेकिन ये प्रतिशत 65 भी क्रॉस नहीं कर पाया। सोनीपत में भी कुछ ऐसा ही हाल देखने को मिला। यहां तो 62.3 फीसदी लोगों ने ही मतदान किया। जबकि यहां भी ज्यादा मतदान की संभावनाएं दिख रही थीं।

अब बात करते हैं जीटी बेल्ट, बागड़ और बांगर इलाकों की। आपको बता दें कि यह वही बेल्ट है, जहां किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर रहा था। इसका कारण ये है कि अंबाला से किसान आंदोलन शुरू हुआ था और फिर जीटी रोड से होते हुए कुरुक्षेत्र, करनाल, पानीपत और फिर सोनीपत से दिल्ली के साथ लगते बॉर्डर तक पहुंचा था । इसके बाद दिल्ली के बॉर्डर पर किसानों ने डेढ़ साल तक धरना लगाया था। जिसमें 700 के करीब किसान शहीद भी हो गए थे। बांगर क्षेत्र में आने वाले जींद, कैथल के किसानों ने किसान आंदोलन में भरपूर हिस्सा लिया था। लेकिन दूसरी ओर अहीरवाल क्षेत्र की बात करें जहां समय-समय पर अहीर रेजिमेंट की मांग उठती रही है यहां गुरुग्राम और फरीदाबाद में 60 फीसदी से भी कम मतदान हुआ, जिसे देख बीजेपी ने जरूर राहत की सांस ली होगी। लेकिन दूसरी तरफ भिवानी-महेंद्रगढ़ की सीट जो जाट और अहीरवाल दोनों को मिलाकर बनती है यहां मतदान अधिक हुआ जिससे कांग्रेस उत्साहित है और इसे अपने पक्ष में मान रही है। क्योंकि पिछले दस साल से यहां बीजेपी काफी मजबूत स्थिति में रही है। लेकिन अबकी बार के समीकरण कांग्रेस को अपने पक्ष में बनते हुए लग रहे हैं।
बहरहाल अब चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में ढालने का सिलसिला चार जून तक चलेगा। क्योंकि चार जून ही वो दिन है जब सब समीकरण एक तरफ होंगे और जनता का फैसला एक तरफ होगा, सर्वोपरि होगा। लेकिन तब तक आप इस जीत-हार की गुणा-भाग का मजा जरूर ले सकते हैं।