नवंबर के दूसरे हफ्ते में हरियाणा विधानसभा का शीतकालीन सत्र संभव, विपक्ष नहीं चुन पाया अपना नेता, क्या बिना नेता प्रतिपक्ष होगा ये सत्र ?

नवंबर के दूसरे हफ्ते में हरियाणा विधानसभा का शीतकालीन सत्र संभव, विपक्ष नहीं चुन पाया अपना नेता, क्या बिना नेता प्रतिपक्ष होगा ये सत्र ?

हरियाणा विधानसभा का शीतकालीन सत्र नवंबर महीने के दूसरे हफ्ते में बुलाया जा सकता है। खुद मुख्यमंत्री नायब सैनी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि सरकार जल्द ही विधानसभा का शीतकालीन सत्र बुलाएगी। उन्होंने कहा कि इसकी तैयारियां चल रही हैं और राज्यपाल को पत्र लिख दिया गया है।

यहां आपको बता दें कि इससे पहले नई बनी नायब सैनी सरकार एक दिन का विधानसभा सत्र बुला चुकी है जिसमें सभी विधायकों को शपथ दिलाई गई थी साथ ही विधानसभा स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव भी हुआ था। बड़ी बात ये भी है कि हरियाणा का मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अब तक अपना नेता प्रतिपक्ष का चुनाव नहीं कर पाया है। और ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अबकी बार बिना नेता प्रतिपक्ष ही सदन चलेगा ? अगर ऐसा होता है तो ये पहली बार होगा जब सदन की मुख्य कार्यवाही बिना नेता प्रतिपक्ष के चलेगी।

फिलहाल ये विधानसभा सत्र नए चुने गए विधायकों के लिए भी अहम है। क्योंकि सही मायनों में यह उनका पहला विधानसभा सत्र होगा। ऐसे में विधायक अपने एजेंडों पर और अपने क्षेत्र की मांगों और मुद्दों को सदन में जरूर रखेंगे।

दो दिन तक चलने वाला ये शीतकालीन सत्र नई सरकार गठित होने के बाद पहली बार बुलाया जा रहा है।इस बार बीजेपी ने प्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाई है। बीजेपी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया है जबकि कांग्रेस 37 सीटों के साथ प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा दल बना है। लेकिन विडंबना यह है कि कांग्रेस अभी तक अपना नेता प्रतिपक्ष नहीं चुन पाई है। 20 साल में ऐसा पहली बार हो रहा है जब विपक्ष को अपना नेता प्रतिपक्ष चुनने में इतना समय लग रहा है। हरियाणा में 8 अक्टूबर को चुनाव परिणाम आए थे 17 अक्टूबर को हरियाणा में सरकार का गठन हो गया था, अब नवंबर महीने के भी पांच दिन बीत चुके हैं लेकिन विपक्ष अभी तक अपना नेता नहीं चुन पाया है।

इसका मुख्य कारण कांग्रेस को बीते तीन चुनाव में मिली लगातार हार को माना जा रहा है। 2009 में भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन बहुमत से पीछे रह गई थी। 2005, 2009, 2014 और 2019 में चुनाव परिणाम के बाद करीब 15 दिन के अंदर नेता प्रतिपक्ष चुन लिए गए थे।

हालांकि अबकी बार कांग्रेस हाईकमान ने नेता प्रतिपक्ष चुनने के लिए 18 अक्टूबर को 4 पर्यवेक्षक भेजे थे, लेकिन विधायक दल की बैठक में हाईकमान पर फैसला छोड़ दिया गया. इसके बाद से कांग्रेस हाईकमान कोई फैसला नहीं ले पाया है। 2019 की बात करें तो भूपेंद्र सिंह हुड्डा को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था। लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में हुई हार के लिए भूपेंद्र सिंह हुड्डा को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ऐसे में सिरसा सांसद कुमारी सैलजा का गुट हुड्डा को नेता प्रतिपक्ष बनाने का विरोध कर रहा है। इसी के चलते हाल ही में हुड्डा 31 विधायक इकट्ठा कर दिल्ली में अपनी ताकत दिखा चुके हैं।

बहरहाल अब जब हुड्डा का विरोध हो रहा है तो ऐसे में उनके ही गुट से झज्जर से विधायक गीता भुक्कल और थानेसर से विधायक अशोक अरोड़ा का नाम की चर्चा जोरों पर है। हालांकि दूसरी ओर सैलजा गुट से पंचकूला के विधायक चंद्रमोहन बिशनोई का नाम भी चर्चाओं में शामिल है।ऐसे में अब सबकी नजरें इसी बात पर टिकी हैं आखिर किसे नेता प्रतिपक्ष बनाया जाता है।