AMU के अल्पसंख्यक दर्जे पर नई बेंच करेगी फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने पलटा 57 साल पुराना फैसला, 1920 में बनी थी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
AMU को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा दिए जाने के केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपना 57 साल पुराना फैसला पलट दिया है। सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संवैधानिक बेंच ने शुक्रवार को 4:3 के बहुमत से फैसला दिया कि AMU संविधान के आर्टिकल 30 के तहत अल्पसंख्यक दर्जे की हकदार है।
एएमयू को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा दिए जाने के केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपना 57 साल पुराना फैसला पलट दिया है।
AMU के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट की नई बेंच फैसला करेगी। सुप्रीम कोर्ट में इस केस में सुनवाई हुई, सात जजों की संवैधानिक बेंच ने 57 साल पुराना फैसला पलटते हुए शुक्रवार को 4:3 के बहुमत से फैसला दिया कि AMU संविधान के आर्टिकल 30 के तहत अल्पसंख्यक दर्जे की हकदार है।
इससे पहले सन् 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि AMU अल्पसंख्यक संस्थान के दर्जे का दावा नहीं कर सकती है।
लेकिन 2005 में एएमयू ने खुद को अल्पसंख्यक संस्थान माना और मेडिकल के PG कोर्सिस की 50 फीसदी सीटें मुस्लिम छात्रों के लिए आरक्षित कर दीं। हिंदू छात्र इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट गए।
लेकिन हाईकोर्ट ने AMU को अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना। जिसके बाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एएमयू सुप्रीम कोर्ट गया था। 2019 में इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने सात जजों की संवैधानिक बेंच को ट्रांसफर कर दिया था।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि AMU अल्पसंख्यक दर्जे पर अब 3 जजों की रेगुलर बेंच फैसला करेगी। ये तीन जजों की बेंच इस फैक्ट की जांच करेगी कि क्या AMU को अल्पसंख्यकों ने स्थापित किया था। अजीज बाशा केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि AMU सेंट्रल यूनिवर्सिटी है। इसकी स्थापना ना तो अल्पसंख्यकों ने की थी और ना ही उसका संचालन किया था। अब सुप्रीम कोर्ट की ही तीन जजों की बेंच इसी पर अपना फैसला सुनाएगी।
आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बनी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 1920 में बनी थी।
दरअसल सन् 1872 में सर सैयद अहमद खान ने मई 1872 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज फंड की कमेटी बनाई थी। इस कमेटी ने 1877 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की शुरुआत की थी।
इसी बीच अलीगढ़ में एक मुस्लिम यूनिवर्सिटी की मांग तेज हो गई। जिसके बाद मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन की स्थापना की हुई। वहीं 1920 में ब्रिटिश सरकार की मदद से कमेटी ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट बनाकर इस विश्वविद्यालय की स्थापना की।
आपको बता दें कि सन् 1817 में दिल्ली के सादात यानी सैयद खानदान में सर सैयद अहमद खान का जन्म हुआ था। जब सर सैयद 24 साल के हुए तो वे मैनपुरी में उप-न्यायाधीश बन गए। इसी समय उन्हें मुस्लिम समुदाय के लिए अलग से शिक्षण संस्थान की जरूरत महसूस हुई। बाद में इन्हीं के प्रयासों के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अस्तित्व में आई।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाए जाने के बाद पहले से बनी सभी कमेटी को भंग कर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम से एक नई कमेटी बनी। इसी कमेटी को सभी अधिकार और संपत्ति सौंपी गई।
एबीवीपी और दूसरे दक्षिण पंथी संगठनों का कहना है कि राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए 1929 में 3.04 एकड़ जमीन दान दी थी। ऐसे में इस यूनिवर्सिटी के संस्थापक सिर्फ सर अहमद खान नहीं बल्कि हिंदू राजा महेंद्र प्रताप सिंह भी हैं।
1920 से लेकर 1951 तक का समय ऐसा रहा है जब किसी भी गैर मुस्लिमों को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं मिलता था। लेकिन साल 1951 में गैर-मुस्लिमों के लिए भी दरवाजे खुले। इस साल एएमयू एक्ट 1920 के सेक्शन 8 और 9 को खत्म कर दिया गया। इसके तहत मुस्लिम छात्रों को अनिवार्य धार्मिक शिक्षा देने वाली बात खत्म कर दी गई। साथ ही अब किसी भी जाति, लिंग, धर्म के लोगों की एंट्री के लिए यूनिवर्सिटी का दरवाजा खोल दिया गया।
इसके बाद साल 1965 में एक बार फिर बदलाव किए गए। इस बार एएमयू एक्ट 1920 के सेक्शन 23 में बदलाव किया गया। जिसके तहत यूनिवर्सिटी कोर्ट की सर्वोच्च शक्ति को घटाकर बाकी यूनिवर्सिटी की तरह ही इसके लिए एक बॉडी बना दी गई। इसी समय विश्वविद्यालय को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंदर ले लिया गया।
साल 1967 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे का मामला सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच के सामने पहुंचा। इस मौके पर यूनिवर्सिटी प्रशासन ने तर्क दिया कि सर सैयद अहमद खान ने इस यूनिवर्सिटी को बनाने के लिए एक कमेटी बनाई थी। उस कमेटी ने इसे बनाने के लिए चंदा करके धन जुटाया। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कहा गया कि एक अल्पसंख्यक के प्रयासों से अल्पसंख्यकों के फायदे के लिए यूनिवर्सिटी शुरू हुई है। इसलिए इसे अल्पसंख्यक का दर्जा मिलना चाहिए। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सर अहमद खान और उनकी कमेटी ब्रिटिश सरकार के पास गई। सरकार ने कानून बनाकर इस यूनिवर्सिटी को मान्यता दी और उसे शुरू किया। यही वजह है कि इस यूनिवर्सिटी को ना तो मुस्लिमों ने बनाया है और ना ही इसे चलाया है। इस यूनिवर्सिटी की स्थापना उस समय भारत सरकार ने की थी। इसलिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा नहीं दिया जा सकता है।
अब साल 1981 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 13 साल बाद केंद्र सरकार ने एमयू एक्ट के सेक्शन 2(1) में बदलाव किया। और इस यूनिवर्सिटी को मुस्लिमों का पसंदीदा संस्थान बताकर इसके अल्पसंख्यक दर्जे को बहाल कर दिया।
इसी दौरान कानून में इसकी व्याख्या कुछ इस तरह से की गई। कहा गया कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पहले मुहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज की शुरुआत हुई। बाद में इस चलाने वाली कमेटी ने ही अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को शुरू करने की योजना तैयार की। इस कमेटी को सर अहमद खान ने बनाया था। वो एक अल्पसंख्यक थे, इसलिए इस यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक दर्जा मिलना चाहिए।
इसके साथ ही कानून की धारा 5(2)(C)में जोड़ा गया कि ये विश्वविद्यालय भारत के अल्पसंख्यक मुस्लिमों को शैक्षिक और सांस्कृतिक रूप से आगे बढ़ा रहा है। इसलिए अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा मिलने का आधार मजबूत है।
इसके बाद आता है साल 2005। जब ये मामला कोर्ट पहुंचा। इस बार अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इन छात्रों ने कोर्ट के सामने अपनी दो मांगें रखीं।
जिसमें पहली मांग ये थी कि अल्पसंख्यक दर्जे के तहत यूनिवर्सिटी मुस्लिम छात्रों को 75 फीसदी आरक्षण देना बंद करे। क्योंकि एएमयू ने अपने मेडिकल कॉलेज में दाखिले के लिए 75 फीसदी सीटें मुस्लिमों के लिए आरक्षित कर दी थीं। जबकि सामान्य वर्ग के लिए सिर्फ 25 फीसदी सीटें ही रखी गई थीं।
वहीं दूसरी मांग ये थी कि मुस्लिम छात्रों के लिए एडमिशन टेस्ट यूनिवर्सिटी करवाती थी, लेकिन सामान्य वर्ग की 25 फीसदी सीटों के लिए एडमिशन टेस्ट AIIMS करवाता था। इसी कारण छात्रों ने यूनिवर्सिटी पर एडमिशन टेस्ट में भी भेदभाव करवाने का आरोप लगाया।
इसके बाद साल 2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1981 में केंद्र सरकार की ओर से एएमयू को लेकर किए गए संविधान संशोधन को अमान्य करार दे दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक फैसले को गलत तरीके से बदलने की कोशिश की है।
2006 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद से अभी तक AMU के पास अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गईं और हाईकोर्ट के फैसले की समीक्षा करने की मांग की। 2016 में केंद्र सरकार ने याचिका वापस ले ली। जिस पर केंद्र ने अपना तर्क दिया था कि विश्वविद्यालय में SC/ST/OBC/EWS के लिए आरक्षण के खिलाफ है।
अब जब सुप्रीम कोर्ट ने नई बेंच के गठन का फैसला दिया है इससे यूनिवर्सिटी से जुड़े लोगों और मुस्लिम समुदाय को ये उम्मीद है AMU को अल्पसंख्यक का दर्जा दोबारा मिलेगा।